मैं सोंचता हूं
कभी मै अकेला हुआ अपने आप से,
तो कभी मैने खुद को पाया है किसी के एहसास में,
कभी पहाड़ों की उंचार्इ पर चढ़ कर मैने महसूस किया,
कि मै ही हुं इस पूरे संसार का सम्राट,
तो कभी बंद कमरे में बैठ कर सोंचता हुं,
की आखिर क्या है मेरी औकात,
कभी पेंड़ की टहनी पर उल्टे लटक कर कहता हुं,
कि काष मै भी तुम्हारी तरह होता इस दुनिया से अनजान,
एक जगह अपने पैरों को थाम कर मै चुपचाप अपने में हो जाता कुछ तुम्हारी तरह स्तब्ध,
तो कभी किसी मषहूर हस्ती को अपने चलचित्र मेंं देख कर कहता हूं,
कि काष मै भी अपना दर्द कुछ आप ही के अंदाज में कह पाता,
कभी बादलों को एकटक निहारते हुए सोंचता हुं कि आखिर ये बादल कहां जाते हैं
फिर अपने आप से कहता हूं कोर्इ मंजिल तो इनकी भी होगी,
और अगर नही भी होगी तो क्या हूआ, पूरे संसार को ये देख तो सकती है,
मेरी तरह घुट-घुट कर इन्हे रोना तो नही पड़ता ,
तभी नजर जाती है मेरी उपर उड़ते हुए उन पंक्षीयों की ओर
जो गगन मे अपने पंखो को फैलाकर
तेज हवाओं और धुधले बादलों के बीच फंसी होती है,
हर बार कोषिष करती है की किसी तरह इन तेज हवाओं को चिरते हुए आगे निकल सके,
लेकिन अंतत: वो निराष होकर वापस जमीन पर आ जाती है,
तब लगा की उपर जाकर कुछ हासिल नही हो सकता
और अब मुझे इसकी अहमियत समझ में आती है,
और अब मै ये सोंचता हुं कि अपने जीवन के इतने वर्षों को मैने व्यर्थ ही रोते गाते बिताया,
किसी को अपनी यादों में पाया तो कभी किसी की यादों में खुद को पाया,
क्या मिला किसी को इस जिन्दगी में, हंसने रोने से ,
क्या मिला किसी को कुछ पा कर, या किसी के कुछ खोने से,
खुष रहना सीखो, हर हाल में जिन्दगी के,
क्योंकि ना कोर्इ भगवान है, और ना कोर्इ तुमसे बलवान है,
बस ये सोंचकर चल, तेरी खुद की सोंच ही महान है,
मेरे अंतिम शब्द को जरा ध्यान से सुनना और फिर दे सकतें हैं आप मुझे अपना बयान
क्या उसने हमें बनाया है या हमने उसे बनाया, जिसे लोग बड़ी श्रद्धा के साथ कहते हैं महान,।
बजरंग यादव रायगढ़